नमस्कार मित्रों,
व्याकरण के "पद विकारी तत्त्व खंड" के अंतिम भाग 'कारक' अध्याय का हम आज अध्ययन करेंगे। साथियों, व्याकरणिक नियमों के अनुसार वाक्य रचना करने पर हम ये जान सकते हैं, कि किस प्रकार कारक भी पदों में विकार लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसी बारे में आज का पोस्ट है। नियमित अध्ययन हेतु Blog को Fallow जरूर कर लें और अपने मित्रों में Share भी करें। आज का टॉपिक कैसा लगा, इस पर Comment ज़रूर करें। तो आइये शुरू करते हैं आज का Topic......
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अध्याय - 14
कारक
परिभाषा :- "क्रिया जनकत्वं कारकं" अर्थात् जो क्रिया को करते हैं वही कारक है। या दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं, जिसका संबंध क्रिया के साथ हो उसे कारक कहते हैं।
➤ संस्कृत में इन कारकों के निश्चित क्रम को विभक्ति कहते हैं, जो प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक) से सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) तक कुल सात होती है।
➤ कारक चिह्नों को 'परसर्ग' भी कहते हैं।
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विभक्ति कारक चिह्न (परसर्ग)
प्रथमा कर्ता ने
द्वितीया कर्म को/की ओर/की तरफ
तृतीया करण से/के द्वारा
चतुर्थी संप्रदान के लिए
पंचमी अपादान से (पृथक्)
षष्ठी संबंध का/के/की
सप्तमी अधिकरण में/पर
------ संबोधन हे!, अरे!, ओ!
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(1) कर्ता कारक :- जो किसी क्रिया को करने वाला हो उसे कर्ता हैं। इसमें प्रथमा विभक्ति होती है। इसका कारक चिह्न 'ने' होता है।
[नोट :- भूतकालिक क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य के साथ 'ने' परसर्ग (कारक चिह्न) का प्रयोग नहीं है।]
- गोपाल कल गाँव जायेगा।
- माता खाना बना रही है।
- रमेश ने पाठ याद कर लिया है।
➡ कर्म वाच्य या भाव वाच्य में कर्ता हमेशा करण कारक में होता है।
- वह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता। (कर्तृ वाच्य)
- उसके द्वारा पेड़ पर नहीं चढ़ा जा सकता। (भाव वाच्य)
- गणेश पाठ पढता है। (कर्तृ वाच्य)
- गणेश के द्वारा पाठ पढ़ा जाता है। (कर्म वाच्य)
(2) कर्म कारक :- क्रिया का प्रभाव जिस पर पड़ता है, अर्थात् कर्ता द्वारा की जाने वाली क्रिया जिस पर आश्रित हो उसे कर्म कहते है। इसमें द्वितीया विभक्ति होती है। इसका कारक चिह्न 'को/की ओर' होता है।
[नोट :- प्राणीवाचक संज्ञा के साथ 'को' कारक चिह्न प्रयुक्त होता है और अप्राणीवाचक संज्ञा के साथ ये कारक चिह्न प्रयुक्त नहीं होता है।]
- पक्षी दाना चुगते हैं।
- माली फूल तोड़ता है।
- ग्वाला गायों को चराता है।
- अध्यापक छात्रों को पाठ पढ़ाते हैं।
- माता बच्चे को दूध पिलाती है।
(3) करण कारक :- कर्ता द्वारा की जाने वाली क्रिया में जो साधन के रूप में प्रयुक्त हो करण कारक कहते हैं। इसमें तृतीया विभक्ति होती है। इसका कारक चिह्न 'से/के द्वारा' होता है।
- नकुल गेंद से खेलता है।
- मैं बस के द्वारा गाँव गया।
- सबको पत्र के द्वारा सूचित किया जा चुका है।
- उसने तलवार से प्रहार किया।
➨ अंगविकार में भी कारण कारक होता है।
- वह सिर से गंजा है।
- वह आँख से काना है।
➡ कभी-कभी 'से' परसर्ग लुप्त भी रहता है, ऐसे में साधन को पहचान कर के ही इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
- उसने आँखों देखी घटना का जिक्र किया। (आँखों से)
- अकाल ने सैकड़ों लोग भूखों मर गए। (भूख से)
(4) संप्रदान कारक :- किसी क्रिया के करने या होने में जो निमित्त हो अर्थात् कोई क्रिया किसी के निमित्त की जाये वहाँ सम्प्रदान कारक होता है। इसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। इसका कारक चिह्न 'के लिए' होता है।
- माता ने बच्चों के लिए खीर बनाई।
- शिक्षक ने परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र तैयार किया।
➨ नमस्कार, आशीर्वाद, प्रणाम इत्यादि शब्दों के योग में आने वाले शब्दों में हमेशा संप्रदान कारक होता है।
- मैं ईश्वर को नमस्कार करता हूँ।
- पूज्यजनों को प्रणाम।
- गुरु शिष्यों को आशीर्वाद देते हैं।
➡ देना, प्रदान करना, बाँटना, भेंट करना इत्यादि अर्थों में हमेशा सम्प्रदान कारक होता है।
- सेठ ने मजदूरों को वेतन बाँटा।
- दीक्षांत समारोह में सभी को उपाधियाँ प्रदान की गई।
- उसने गरीबों को खाद्य सामग्री बाँटी।
(5) अपादान कारक :- वाक्य में जहाँ दो संज्ञाओं के पृथक्करण का बोध हो वहाँ अपादान कारक होता है। इसमें पंचमी विभक्ति होती है। इसका कारक चिह्न भी 'से' ही होता है, किन्तु ध्यान रहे ये पृथक् करने के अर्थ में हो।
- सवार घोड़े से गिर गया।
- मोहन तो जल्दी ही घर से निकल गया।
- वह रस्ते से भटक गया।
- उसने पक्षी को पिंजरे से मुक्त किया।
- उसे अब सेवा मुक्त कर दिया गया।
- उसने मेरी पुस्तक से एक पन्ना फाड़ लिया।
➡ अन्य, बाहर, इतर, भिन्न, पृथक्, अतिरिक्त इत्यादि शब्दों के योग में हमेशा अपादान कारक होता है।
- गाँव से बाहर एक पुराना मंदिर है।
- इस कक्षा में कृष्ण के अतिरिक्त कोई इसका समाधान नहीं ढूंढ सकता।
➡ भय, रक्षा, घृणा, लज्जा, अवरोध, हटाना इत्यादि शब्दों के साथ हमेशा अपादान कारक होता है।
राजा शत्रुओं से राज्य की रक्षा करता है।
- जंगल में तो सभी हिंसक पशुओं से डरते हैं।
- किसान आवारा पशुओं को खेत से हटाता है।
➡ दो की तुलना में जिससे तुलना की जाये उसमें अपादान करक होता है।
- मोहित भुवन से श्रेष्ठ है।
- वह तुमसे तेज दौड़ता है।
➡ किसी कार्य के आरम्भ का बोध कराने वाले शब्द में सदैव अपादान कारक होता है।
- इस बार तो जुलाई से ही बरसात शुरू हो गई।
- लम्बे समय से मैं कहीं बाहर नहीं गया।
(6) संबंध कारक :- जहाँ दो संज्ञाओं के मध्य किसी संबंध का बोध हो वहाँ संबंध कारक होता है, इसमें षष्ठी विभक्ति होती है। इसका कारक चिह्न 'का/की/के' होता है।
- तेज धूप से त्रस्त पशु पेड़ की छाया में बैठ गए।
- हमारा गाँव यहाँ से बहुत दूर है।
- गन्ने का रस गर्मियों में अमृत तुल्य है।
- गुलाब के फूलों की खुशबू दूर-दूर तक फैली थी।
- जल ही जीवन का आधार है।
➡ ऊपर, अंदर, मध्य, बीच इत्यादि शब्दों के योग में हमेशा संबंध कारक होता है।
- तालाब के मध्य कुछ कमल के फूल खिले हैं।
- इस गुफा के अंदर एक शेर हो सकता है।
(7) अधिकरण कारक :- किसी कार्य या क्रिया के करने या होने का जो आधार हो उसे अधिकरण कारक कहते हैं। इसमें सप्तमी विभक्ति होती है। इसका कारक चिह्न 'में/पर' होता है।
- वार्षिक परीक्षाएँ मार्च में होती है।
- पेड़ों पर बन्दर बैठे हैं।
- ऋषि-मुनि जंगलों में वर्षों तक तपस्या में लीन रहते थे।
- भारतीय धर्मग्रंथों में अद्भुत् ज्ञान भरा है।
➡ किसी समूह के साथ तुलना करने पर अधिकरण कारक होता है।
- पशुओं में शेर सबसे ताकतवर होता है।
- कक्षा में भावेश सबसे होनहार छात्र है।
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कैसा लगा आज का टॉपिक Comment अवश्य करें। अगली पोस्ट में हम 'वाक्य' अध्याय पर चर्चा करेंगे। अगर ये पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे शेयर अवश्य करें और ब्लॉग को Fallow जरूर कर लें।
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अव्यय (समुच्चयबोधक अव्यय)
अव्यय (संबंधबोधक अव्यय)
अव्यय (विस्मयादि बोधक अव्यय)
सूचनाप्रद जानकारी देने के लिए धन्यवाद।
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